Dahej Pratha Ek Abhishap, An Essay in Hindi - Hindi Nibandh, Rachna on Evils of Dowry System दहेज प्रथा - एक अभिशाप

 


Dahej Pratha Ek Abhishap 

(Evils of Dowry System दहेज प्रथा - एक अभिशाप)

 Essay in Hindi - Hindi Nibandh, Rachna 

विधि की विडम्बना है कि एक ही वृक्ष पर लगे दो पुष्पों में से एक को जो अधिक सुरोभित और सुरम्य होता है, उसे अभिशाप समझ लिया जाता है और दूसरों को कष्ट में होते हुए भी वरदान। जन्म से ही परिवारवाले लड़की को 'पराया धन' कहना प्रारम्भ कर देती है। परिवार में कन्या के जन्म से ही इन उमड़ते बादलों के तीन कारण हैं -
१. पराया धन होने के कारण कन्या के भावी सुखमय जीवन चिन्तापूर्ण कल्पनाएँ,
२. दहेज,
३. मानव की स्वार्थी मनोवृत्ति।
माता-पिता की प्यार भरी दृष्टि और स्नेह भरे हृदय पर सबसे भयंकर वज्रपात दहेज का होता है। दहेज शब्द अरबी भाषा के 'जहेज' शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिंदी में आया है, जिसका अर्थ होता है 'सौगात' अर्थात् भेंट। इस सौगात की परम्परा भारतीय रीती-नीति में कबसे प्रचलित हुई, यह सृष्टि के आदि क्षणों एवं क्रमशः विकाशवाद की खोज के साथ जुड़ी हुई है। जो चीज़ सामाजिक परम्परा के रूप में आरम्भ हुई, वह वर्षों बाद महान् सामाजिक संकट बन गया।

दहेज भारतीय समाज और संस्कृति के पवित्र ललाट पर एक महान कलंक है। रावण ने केवल एक सीता का हरण कर उसके जीवन को कष्टमय बनाया था परन्तु दहेज रूपी रावण ने न जाने कितनी कन्याओं को सौभाग्य सिंदूर से वंचित करके उनके जीवन को ही कष्टमय बना दिया। हजारों कन्याओं की माँग में सिंदूर इसलिए न भरी जा सकी, चूँकि उनके माता-पिता इतना दहेज न दे सकते थे जितना की लड़केवाला माँगता था। पुत्री-विवाह से जुड़ा दहेज की अस्वस्थता भारतीय समाज को इतना आतंकित कर दिया है की परिवार में पुत्री का जन्म होना ही अशुभ माना जाता है।

दहेज मानव जाति के लिए एक अभिशाप है। इससे राष्ट्र को व्यक्तिगत और समष्टिगत हानियाँ होती है। दहेज के प्रभाव में लड़की अयोग्य वर को सौंप दी जाती है। बेमेल विवाह ज़्यादा दिन टिकाऊ नहीं होते। यदि किसी प्रकार चातुर्य से लड़की को अच्छा घर और अच्छा वर मिल भी गया और दहेज इच्छानुकूल उनके साथ न पहुँचा, तो सास और ननद की कलह लड़की की जान ले लेती है। वह या तो पिता के घर वापस आ जाती है, या उसे मौत की शरण लेनी पड़ती है। दहेज के कारण वधु-हत्या की घटनाएँ भी आए दिन अखबार में देखने को मिलते हैं।

वर्ग वैषम्य के साथ-साथ दहेज रूपी यह महान रोग बढ़ता गया। भारत सरकार ने १९६१ में दहेज निरोधक अधिनियम बनाया, परन्तु जनता के पूर्ण सहयोग के अभाव में यह सफल न हो सका। सच माने तो इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी है। इससे लड़ने के लिए मात्र कानून ही प्रभावी शस्त्र नहीं है। आवश्यकता है इस बात की कि लोगों के दृष्टिकोणों को बदला जाए। यदि भारत के प्रत्येक नागरिक हृदय से दहेज न लेने और न देने की प्रतिज्ञा कर ले, तब यह समस्या समाप्त हो सकती है। प्रत्येक भारतीय को यह नारा बुलन्द करना चाहिए की -
"दुल्हिन ही दहेज है"।

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