Reerh Ki Haddi by Jagdish Chandra Mathur - CBSE NCERT Solutions for Chapter 3, Class 9 Hindi Kritika Bhag 1 - रीढ़ की हड्डी

 


CBSE Class 9 NCERT Solutions of Chapter 3, Kritika Bhag 1 

Reerh Ki Haddi by Jagdish Chandra Mathur

रीढ़ की हड्डी 

प्रश्न: 'रीढ़ की हड्डी' कहानी को संक्षेप में लिखिए (Summary). 
उत्तर: 'रीढ़ की हड्डी' कहानी में लेखक ने समाज में स्त्रियों के प्रति व्याप्त रूढ़िवादी मानसिकता पर प्रहार करते हुए स्त्रियों की शिक्षा एवं उससे उत्पन्न उनके आत्मविश्वास और साहस को दर्शाया है। इसी तरह इस एकांकी कहानी में रामस्वरूप और प्रेमा उसकी पत्नी के विचारों को दर्शाया है। रामस्वरूप अपनी बेटी उमा को पढ़ाया - लिखाया और एक अच्छे पिता होने का कर्तव्य निभाया। रामस्वरूप अपनी बेटी का विवाह उनके रिश्तेदार गोपाल प्रसाद के बेटे शंकर से करवाना चाहता था जो कि पढ़ा - लिखा होने के साथ-साथ अच्छे घर का था। लड़के का पिता, गोपाल प्रसाद पुराने विचारधारा में विश्वास रखने वालों में से थे। वे नए ज़माने की रहन - सहन से संतुष्ट नहीं थे। वे चाहते थे कि उनके परिवार में स्त्रियाँ सिर्फ घर की काम-काज में निपुण हों। बाहर जाकर नौकरी करने वाली स्त्रियाँ उन्हें पसंद नहीं थी।  
परन्तु उमा ने जब यह सब देखा तो उसे रहा न गया और उसने बताया कि आपके विचार से मैं सहमत नहीं हूँ क्योंकि अगर लड़के बाहर काम करने जा सकते हैं, तो लड़कियाँ क्यों नहीं? और उन्होंने शंकर के बारे में सारी बातें बता दी। कहानी के अंत में रिश्ता टूट जाता है। इस कहानी में छह पात्रों का किरदार निभाया गया है और वे हैं - रतन, रामस्वरूप, गो.प्रसाद, शंकर, उमा और प्रेमा।          

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर (CBSE NCERT Solutions of Exercise Questions)

प्रश्न: रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर "एक हमारा ज़माना था . . ." कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?
उत्तर: मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह अपने अतीत से चिपका रहना चाहता है।  सभी को अपना अतीत सदैव सुखदायी लगता है। अपने अतीत की बातों को याद करके वह मन ही मन प्रसन्न होता रहता है। रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद को भी अपना ज़माना याद आता है। वे अक्सर अपने बीते ज़माने की तुलना वर्तमान से करते हैं। अपना ज़माना याद आना स्वभाविक है परंतु इस तरह की तुलना करना बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है। 

समय परिवर्तनशील है। अत: समय बदलने के साथ-साथ लोगों की मानसिकता, विचारधारा, रहन-सहन, आर्थिक तथा सांस्कृतिक बदलाव आना स्वाभाविक है। वैसे भी हर ज़माने की अपनी स्थितियाँ अलग होती हैं जिनके साथ आये बदलाव भी उस समय के सापेक्ष ही होते हैं।  ऐसे में "एक हमारा जमाना था ...." कहकर अपने जमाने को श्रेष्ठ साबित करना और वर्तमान को नीचा दिखाना न केवल परोक्ष रूप से वर्तमान पीढ़ी को अपमानित करना है बल्कि, ऐसा करना अप्रासंगिक एवम अनुचित भी लगता है। अतः इस प्रकार की तुलना करने के वजाय अतीत और वर्तमान में सदा सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए।        

प्रश्न: रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है? 
उत्तर: रामस्वरूप अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाता है। वह मानता है कि लड़कियों के लिए भी शिक्षा उतनी ही जरुरी है जितनी लड़को के लिए होती है। वह नारी-शिक्षा का पक्षधर है किन्तु जब उसकी विवाह का समय आता है तब उसे समाज की पिछड़ी मनोभावना का शिकार होना पड़ता है। जब उसे गोपाल प्रसाद के लड़के के साथ रिश्ता करना होता है तो वह अपनी बेटी की शिक्षा छिपाता है। एक लड़की की पिता होने की विवशता उससे ऐसा करवाती है।
रामस्वरूप चाहता है कि उसकी बेटी का विवाह गोपाल प्रसाद का बेटा शंकर से हो जाए परंतु गोपाल प्रसाद चाहते हैं कि उनकी बहु अधिक पढ़ी-लिखी न हो। लड़का तथा सास-ससुर को ऐसा लगता ही कि पढ़ी-लिखी बहु उनके नियंत्रण में नहीं रहेगी। अतः रामस्वरूप को विवश होकर अपनी बेटी की उच्च शिक्षा को छिपाना पड़ता है।

प्रश्न: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं हैं?

उत्तर: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह गलत है। वे अपनी पढ़ी-लिखी बेटी को कम पढ़ा-लिखा साबित करना चाहते हैं,जो कि बिल्कुल अनुचित है। साथ ही वे उमा की सुन्दरता को और भी बढ़ाने के लिए नकली प्रसाधन सामग्री को उपयोग करने के लिए कहते हैं जो अनुचित है। 
गोपाल प्रसाद उमा से तरह - तरह के सवाल पूछते हैं।  रामस्वरूप चाहता है की उनकी बेटी उमा सभी सवालों का उत्तर बड़े सहज भाव से दे।  वह यह भी चाहता है की गोपाल प्रसाद द्वारा पूछे गए बेहूदा प्रश्नों का भी वह चुपचाप उत्तर देती जाए और उनके द्वारा किये गए अपमान को चुपचाप सहन कर ले क्योंकि वे लड़के वाले हैं।  
रामस्वरूप का अपनी बेटी से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा करना बिलकुल गलत है। रामस्वरूप यह क्यों भूल रहे हैं कि जिस प्रकार लड़के की अपेक्षाएँ होती हैं ठीक उसी प्रकार लड़कियों की पसंद-नापसंद का भी ख्याल रखना चाहिए। आजकल समाज में लड़का तथा लड़की को समान दर्जा प्राप्त है। दोनों ही बराबर की शिक्षा के अधिकारी हैं और विवाह के समय केवल लड़की होने के कारण उसे चुपचाप अपना अपमान सहना पड़े, यह सरासर गलत है।
     
प्रश्न: गोपाल प्रसाद विवाह को 'बिज़नेस' मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।  
उत्तर: 

प्रश्न: ". . . . . . आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं  . . . " उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है? 
Reedh Ki Haddi by Jagdish Chandra Mathur - CBSE NCERT Solutions for Chapter 3, Class 9 Hindi Kritika - रीढ़ की हड्डी
उत्तर: उमा गोपाल प्रसाद जी के विचारों व उनके द्वारा किए गए अनगिनत सवालों के कारण पहले ही खिन्न हो चुकी थी। वह एक पढ़ी-लिखी, स्वाभिमानी लड़की थी। गोपाल प्रसाद के एक व्यंग ने जब उमा को चुप्पी तोड़ने पर मजबूर कर दिया तब अंत में इस कथन के माध्यम से उमा ने भी गोपाल प्रसाद को उनका बेटा शंकर की कई कमियों की ओर ध्यान दिला दी, जैसे :

१. शंकर एक परमुखापेक्षी और पराश्रित जीवन जीने वाला व्यक्तित्वहीन आदमी है। वह अपने पिता के इशारों पर हीं-हीं करने वाला बेचारा जीव है। उसे जैसा कहा जाता है वैसा ही करता है। वह पिता की उचित - अनुचित सभी बातों पर हाँ-हाँ करता चलता है। ऐसा कायर, विचारशक्तिहीन व्यक्ति पति होने योग्य नहीं है। 

२. उसको अपने मान-सम्मान की परवाह भी नहीं है। लड़कियों के पीछे मँडराने के चलते वह पहले ही अपना इज्जत खो चुका था। बुरी आदतों के चलते लड़कियों के हॉस्टल में उसका सरेआम अपमान हो चुका था। यानी, शंकर एक अपमानित, लंपट और दुश्चरित्र व्यक्ति है जिसका न तो कोई मनोवल हथा और न ही कोई व्यक्तित्व। 

३. उसका शरीर भी उसकी व्यक्तित्व की तरह कमजोर था। शंकर से सीधा तन कर बैठा भी नहीं जाता। वह उम्र से नौजवान होते हुए भी एक बुढ़े के समान है। 

प्रश्न: शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की - समाज को कैसे व्यक्तित्व की ज़रूरत है? तर्क सांगत उत्तर दीजिए।  
उत्तर: समाज को आज उमा जैसे व्यक्तित्व वाली, शिक्षित, स्पष्टवादिनी, बहादुर, निडर तथा स्वाभिमानी लड़की की ही ज़रूरत है । ऐसी लड़कियाँ ही गोपाल प्रसाद जैसे दिशाभ्रष्ट, दोहरी मानसिकता रखने वाले, डरपोक, लालची और ढोंगी लोगों को सबक सिखा सकती हैं। उमा जैसी लड़कियाँ ही समाज और देश को सच्चाई, सभ्यता और प्रगति के मार्ग दिखला सकती हैं। इसके विपरीत शंकर जैसे व्यक्तित्वहीन, कमज़ोर, परमुखापेक्षी एवं चरित्रहीन लड़के समाज के लिए निरुपयोगी है। ऐसा व्यक्ति समाज को कोई दिशा प्रदान नहीं कर सकता। सच कहा जाय तो शंकर जैसा व्यक्ति समाज के लिए बोझ है, जबकि उमा जैसी लड़की समाज का वर्तमान व आनेवाले पीढ़ियों के लिए एक अच्छी प्रेरणा है।  

प्रश्न: 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक की  सार्थकता स्पष्ट कीजिए।  
उत्तर: 'रीढ़ की हड्डी' एक प्रतीकात्मक तथा व्यंग्यात्मक शीर्षक है जो इस कहानी की भावना को तथा समाज की सड़ी-गली और दोहरी मानसिकता को बिलकुल सही तरीके से व्यक्त करता है एवं उस पर प्रहार  है। 
इस कहानी के जरिये लेखक समाज में हो रहे लड़कियों की उपेक्षा पर ध्यान आकर्षित करते हुए समाज की कुछ कमज़ोरी, साथ ही नारी-शिक्षा की महत्व और आवश्यकता को बताने की कौशिश किये हैं। 
समाज को कमज़ोर करते है शंकर जैसा लोग जो शिक्षित नवयुवक होते हुए भी व्यक्तित्वहीन, विचारशक्तिहीन, चरित्रहीन, परजीवी और सारी उम्र दूसरों के इशारों पर ही चलते हैं। यदि शंकर समझदार, साहसी और व्यक्तित्वसंपन्न युवक होता तो गोपाल प्रसाद की इतनी हिम्मत न होती कि वह दो सुशिक्षित वयस्कों के बीच में बैठकर अपनी फूहड़ बातें करे और अशिक्षा को प्रोत्साहन दे। शंकर की कायरता और उसकी असक्षमता कुछ ऐसा था जिसे दर्शाने के लिए उसे बिना रीढ़ की हड्डी के कहा गया है। अगर समाज में शंकर और गोपाल प्रसाद जैसे लोगों का बोल-बाला हो जाय तो ऐसे समाज को भी ‘बिना रीढ़ की हड्डी वाला समाज’ कहा जा सकता है।
इस प्रकार 'रीढ़ की हड्डी' एक संकेतपूर्ण, जिज्ञासातुर, व्यंग्यात्मक और सफल शीर्षक है।  
                    
प्रश्न: 'रीढ़ की हड्डी' कथावस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों? 
उत्तर: 

Class 9 Kritika Answers - Reerh Ki Haddi by Jagdish Chandra Mathur

प्रश्न: एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।  
उत्तर: 

प्रश्न: इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।  
उत्तर: इस एकांकी का उद्देश्य समाज में औरतों की दशा को सुधारना तथा उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक कराना है। लेखक समाज में हो रहे लड़कियों की उपेक्षा पर ध्यान आकर्षित करते हुए समाज की कुछ कमज़ोरी, साथ ही नारी-शिक्षा की महत्व और आवश्यकता को बताने की कौशिश किये हैं। यह एकांकी उन लोगों की तरफ़ अँगुली उठाती है जो समाज में स्त्रियों को पुरूषों की तुलना में कुछ समझते ही नहीं और उन्हें परिवार की मर्यादा देने के वजाय घर सजाये जानेवाला निर्जीव वस्तु समझते हैं। 
पुरूषों की पक्षपाती समाज-व्यवस्था में शादी-विवाह के अवसर पर वैवाहिक संबंध तय करते समय लड़कियों के साथ पशुवत् व्यवहार किया जाता है। उनका इस प्रकार निरीक्षण, जाँच या तोल-मोल किया जाता है, जैसे वे कोई बेजान-वस्तु हों जिनका कोई मान-सम्मान या अपनी इच्छा नहीं होता। प्रस्तुत एकांकी एक ओर जहाँ लड़का-लड़की के भेदभाव से ग्रसित समाज को आईना दिखाकर उसकी दूषित मनोवृत्ति पर कुठाराघात करती है; वहीं दूसरी ओर नारी की व्यक्तित्व, नारी-स्वतंत्रता, नारी-शिक्षा का परचम बुलंद करती है।

प्रश्न: समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन-कौन से प्रयास कर सकए हैं?  
उत्तर:    




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