Hindi Kshitij NCERT Answers and Solutions of CBSE Class IX - उपभोक्तावाद की संस्कृति

 

उपभोक्तावाद की संस्कृति

 KSHITIJ BHAG - 1 

Class IX, Hindi Course (A) - Solutions of CBSE (NCERT) Hindi textbook exercise questions

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रचना और अभिव्यक्ति 
Question 5: कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी.वी. पर विज्ञापन देख कर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं। क्यों?    
Answer: टी .वी .पर दिखाए जानेवाले विज्ञापन बहुत सम्मोहक एवं प्रभावशाली होते हैं। वे हमारी आँखों और कानों को विभिन्न दृश्यों और ध्वनियों के सहारे प्रभावित करते हैं। वे हमारे मन में वस्तुओं के प्रति भ्रामक आकर्षण पैदा करते हैं। 'खाए जाओ ','क्या करें ,कंट्रोल ही नहीं होता','दिमाग की बत्ती जला देती है' जैसे आकर्षण हमारी लार टपका देते हैं। इसके प्रभाव में आनेवाला हर व्यक्ति इनके वश में हो जाता है।     और इस तरह अनुपयोगी वस्तुएँ भी हमें लालायित कर देती हैं।    

Question 6: आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन ? तर्क देकर स्पष्ट करें।   
Answer: वस्तुओं को खरीदने का एक ही आधार होना चाहिए - वस्तु की गुणवत्ता। विज्ञापन हमें गुणवत्ता वाली वस्तुओं का परिचय करा सकते हैं। अधिकतर विज्ञापन हमारे मन में वस्तुओं के प्रति भ्रामक आकर्षण पैदा करते हैं।। वे आकर्षक दृश्य दिखाकर गुणहीन वस्तुओं का प्रचार करते हैं। उदाहरणतया,चाय की पत्ती के विज्ञापन में लड़कियों के नाच का कोई काम नहीं। परंतु अधिकतर लोग नाच से इतने प्रभावित होते हैं कि दुकान पर खड़े होकर वही चायपत्ती खरीद लेते हैं, जिसका ताज़गी से कोई संबंध नहीं। हमें 'वाह ताज!' जैसे शब्दों के मोह में न पढ़कर चाय की कड़क और स्वाद पर ध्यान देना चाहिए। वही हमारे काम की चीज़ हैं।  

Question 7: पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही "दिखावे की संस्कृति" पर विचार व्यक्त कीजिए।  
Answer: यह बात बिल्कुल सच है की आज दिखावे की संस्कृति पनप रही है। इसलिए लोग उन्हीं चीजों को अपना रहे हैं, जो दुनिया की नज़रों में अच्छी हैं। सारे सौंदर्य-प्रसाधन मनुष्यों को सुंदर दिखाने के ही प्रयास करते हैं।आज लोग समय देखने के लिए घड़ी नहीं खरीदते, बल्कि अपनी हैसियत दिखाने के लिए हजारों क्या लाखों रुपए की घड़ी पहनते हैं। यहाँ तक कि लोग मरने के बाद अपनी कब्र के लिए लाखों रूपए खर्च करने लगे हैं ताकि वे दुनिया में अपनी हैसियत के लिए पहचाने जा सकें। यह दिखावे की संस्कृति नहीं तो और क्या।

दिखावे की संस्कृति के बहुत से दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं, जैसे -

  • सामाजिक अशांति फ़ैल रही है। 
  • लोग अपने सांस्कृतिक पहचान भूल रहे हैं। 
  • नैतिक मर्यादाएँ घट रही हैं। 
  • व्यक्तिवाद, स्वार्थ, भोगवाद आदि कुप्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। 

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